ON SALE




ON SALE
19 decimal private land with a House
at Sabitri Ghising Road, Bong Busty Kalimpong.
Single storied house has 3 Bedrooms,
Living room, Kitchen & Dining room,
3 Bathroom-cum-toilets
Contact: thulungakrai@gmail.com
or 9434131719


6 Apr 2017

दिल्ली में उठाए गए गोर्खा प्रदेश और स्वदेशी लोगों के अधिकारों की मांग

राजेश शर्मा, कालिमन्युज, नई दिल्ली 5 अप्रैल । नई दिल्ली में स्थित भारतीय न्यायिक संस्थान(इंडियन लॉ इंस्टिट्यूट) में राष्ट्रीय क्षेत्रीय मंच और लाइव वैल्यू फाउंडेशन द्वारा "क्षेत्रीय न्याय पर सम्मेलन" का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य गोर्खाओं की समस्या और उनके साथ हुए निरंतर पक्षपात और अन्याय पर प्रकाश डालना था।
पहली बार ब्रिटिश भारतद्वारा और फिर भारतीय सरकारोंद्वारा लंबे समय तक कि गइ उपेक्षा को ध्यान में रखते हुए गोर्खा प्रदेश की मांग बढ़ी थी। सन 1814 में एंग्लो-गोर्खा युद्ध से वर्तमान तिथि तक गोर्खा के अमूल्य बलिदान और राष्ट्र की सेवा के लिए अनुकरणीय साहस को सबने माना है। सम्मेलन में दार्जिलिंग,तराई डुवर्स के एवं उत्तरांचल, तेलंगाना और उत्तर-पूर्व से प्रतिभागियों ने भि भाग लिया। साथ ही विभिन्न गोर्खा संगठनों के प्रतिनिधियों भी इस उद्देश्य के लिए एकजुट हुए थे। 
भारत के अधिन रहकर लेकिन पश्चिम बंगाल राज्य से अलग होकर एक नइ राज्य गठन का विषय मे चर्चा को लेकर आयोजित् इस कार्यक्रम मे तेलंगाना और त्रिपुरी स्वदेशी लोगों के प्रतिनिधियों- क्रमशः अनुसूचित जाति के एड्वेट रेड्डी और अघोर देब बर्मन ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।अखिल भारत हिन्दू महासभा के योगी ब्रह्मऋषि ने कहा कि गोर्खालैंड के बजाय गोर्खा प्रदेश की मांग की जानी चाहिए, क्योंकि गोर्खालैंड से नागालैंड जैसे अलगाववाद की दुर्गन्ध आती है। "एबीएचएम गोर्खा प्रदेश का समर्थन करता है। 
 गोर्खाओं को भारत की महिमा में जोड़ा तो गया, लेकिन उनके अधिकार उन्हें नहीं मिल सका जबकि उन्होंने नागा और बोडो की भाँती हथियारों नहीं उठाये। राजनीतिक दलों ने उन्हें बार-बार धोखा दिया है और उन्हें हर बार से झूठी उम्मीदें दीं हैं। उन्हें वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है और बाद में सीट मिलने के बाद मंत्री असल मुद्दा भूल जाते हैं। 
"हम आईएसआई झंडे नहीं फहराते हैं, इसलिए शायद हमें कश्मीरियों की तरह सुविधाएं नहीं मिलतीं। लेकिन हम कश्मीरी नहीं हैं, हमारी मांग अलगाववादी नहीं हैं," यह स्पष्ट् करते हुए क्रामाकपा नेता, उत्तम छेत्री ने अपना वक्तव्य दिया। छेत्री ने कहाँ है कि हम गोर्खाओ ने भारत माता के सुरक्षा को लेकर अपनि प्राण कि आहुति दिया है, जिसका आज तक कोइ मुल्यांकन नहि किया गया है । 
भारत आजादि के संमय से भारत कि सविधान बनाने तक गोर्खा ने दि योगदान सहभागीता यह प्रमाण होता है कि उस बक्त भि गोर्खा पडा लिखा एव राजनैतिक क्षेत्र मे परिपक्क था । जिसका उदाहरण मे यह बताया गया कि -1992 में लागू हुए संविधान में गोर्खाओं की भाषा के पंजीकरण के लिए 43 अहिंसक संवैधानिक युद्धों को लड़ा गया था, छेत्री ने कहा। उन्होंने अपनी दिक्कत भी व्यक्त की और बताया कि 1947 में सिर्फ 1.2 मिलियन सिंधियों के भारत सरकार में 2 प्रतिनिधि थे, लेकिन 3 लाख गोर्खाओं के लिए केवल 1 प्रतिनिधि ही थे। "गणित क्या समझाता है?" छेत्री ने सवाल किया। 
सभी गोर्खा प्रतिनिधियों कि एक सामूहिक पीड़ा व्यक्त करने के लिए एकजुट होना जरूरी है। एक अलग भाषा, भोजन की आदत, चेहरे की विशेषताओं, साहित्य, स्थानीय संस्कृति, किसी विशेष क्षेत्र में बहुसंख्यक बनाने यह गोर्खा वाले एक समुदाय के तहत उस क्षेत्र का एक अलग प्रांत बना सकता है। भारतीय संघ, गोर्खा मातृभूमि अभी भी एक सुदूर स्वप्न है। वरिष्ठ पत्रकार राजेश शर्मा ने प्रस्तावित गोर्खा प्रदेश के माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर बल दिया। अगर भारत सरकार अलग राज्य गठन होता है तो सिक्किम राज्य से लेकर नेपाल, भूटान बंगला देश आदि सिमा से सटा हुआ क्षेत्र पर सुरक्षा का अच्छ होगा जिस पर राज्य बता है तो अछा है ।

Digg Google Bookmarks reddit Mixx StumbleUpon Technorati Yahoo! Buzz DesignFloat Delicious BlinkList Furl

0 comments: on "दिल्ली में उठाए गए गोर्खा प्रदेश और स्वदेशी लोगों के अधिकारों की मांग"

Post a Comment

Kalimpong News is a non-profit online News of Kalimpong Press Club managed by KalimNews. It is published simultaneously in this site as well as http://kalimpongnews.net.
Please be decent while commenting and register yourself with your email id. Your id will be kept secret, as far as practicable.

Popular Posts